
अंबिकापुर में डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय अधिवक्ता संघ का राज्य स्तरीय सम्मेलन संपन्न
संभागीय ब्यूरो जयसिंह यादव
अंबिकापुर। डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय अधिवक्ता संघ भारत द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन अंबिकापुर स्थित पीजी कॉलेज ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत बहुजन मूलनिवासी महापुरुषों के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर की गई।
कार्यक्रम का उद्घाटन हाई कोर्ट बिलासपुर के अधिवक्ता डॉ. अशोक कुमार टंडन ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित छत्तीसगढ़ के केटेगरी एक्टिविस्ट रमेश कुमार जाटवर ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर एक प्रबुद्ध राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि समाज में वकील, डॉक्टर और इंजीनियर तो बने हैं, लेकिन संगठन की कमी आज भी बनी हुई है। देश में धर्म के नाम पर विभाजन किया जा रहा है, जबकि संविधान हमें धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की पहचान देता है। उन्होंने समाज को न्याय प्राप्त करने के लिए सशक्त और संगठित होने का आह्वान किया।

आभार एवं प्रस्तावना वाचन अधिवक्ता झनेंद्र कुमार महिलांग, हाई कोर्ट बिलासपुर एवं प्रदेश संयोजक ने किया। उन्होंने बताया कि संगठन द्वारा छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक गरीब छात्रों के लिए बिलासपुर में विधि पुस्तकालय एवं छात्रावास की व्यवस्था की गई है, जिससे वे कानून की शिक्षा लेकर समाज के अधिकारों की लड़ाई मजबूती से लड़ सकें।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित सर्व आदिवासी समाज जिला अध्यक्ष सूरजपुर बृजमोहन सिंह गोंड ने कहा कि 75 वर्षों के बाद अधिवक्ता संघ द्वारा गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी हेतु छात्रावास की पहल सराहनीय है। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस कार्य में तन-मन-धन से सहयोग करने की अपील की।
कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता शाकीर कुरैशी ने किया। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई, जिनमें उच्च न्यायपालिका में बहुजन मूलनिवासी समाज का प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने के प्रयास, तथा जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे।

सोशल एक्टिविस्ट बीपीएस पोया (जिला अध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग, सूरजपुर) ने अपने संबोधन में कहा कि विधि पुस्तकालय एवं छात्रावास निर्माण समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बहुजन समाज के लोग कानूनी जानकारी के अभाव में न्याय के लिए भटकते रहते हैं और वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर लगाते हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए समाज के बुद्धिजीवियों को आगे आकर सामूहिक प्रयास करना होगा। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं बल्कि वैचारिक और सामाजिक न्याय की लड़ाई है।
कार्यक्रम के अंत में संविधान की प्रस्तावना का वाचन किया गया। सम्मेलन में संघ के पदाधिकारी, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, युवा, छात्र-छात्राएं एवं बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।











