वन विभाग का ‘कमीशन’ राज : लैलूंगा और बाकारुमा रेंज में मजदूरों का ₹8 लाख दबाकर बैठे अधिकारी, बिना रिश्वत फाइलें ‘लॉक’…

वन विभाग का ‘कमीशन’ राज : लैलूंगा और बाकारुमा रेंज में मजदूरों का ₹8 लाख दबाकर बैठे अधिकारी, बिना रिश्वत फाइलें ‘लॉक’…

भाग 1

रायगढ़ । वन मंडल धर्मजयगढ़ में बिना पैसे दिए दूसरों से काम कैसे निकलवाया जाता है, इसकी एक शानदार मिसाल सामने आई है। यहां के बाबू और रेंजर मजदूरों को यह कड़ा सबक सिखा रहे हैं कि पसीना बहाना आपकी जिम्मेदारी है, लेकिन भुगतान पाना विभाग की ‘कृपा’ और आपके ‘सुविधा शुल्क’ (कमीशन) पर निर्भर करता है।

लैलूंगा और बाकारुमा रेंज का ‘अद्भुत’ गणित – वन विभाग के अधिकारियों का गणित इतना लाजवाब है कि लाखों का काम करवाकर मजदूरों को चंद रुपये थमा दिए गए, ताकि वे आगे भी मिन्नतें करते रहें:

  • लैलूंगा रेंज की दरियादिली : यहाँ मजदूरों ने दिन-रात एक करके पूरे 136 नग मुनारों (सीमा स्तंभ) का निर्माण किया। इसके एवज में विभाग ने बड़ी ही उदारता दिखाते हुए मात्र ₹1,85,000 का ही आंशिक भुगतान किया है। शेष ₹6,31,000 की भारी-भरकम राशि को विभाग ने शायद किसी ‘विशेष’ काम के लिए रोक रखा है।
  • बाकारुमा रेंज का शानदार हिसाब : बाकारुमा रेंज (काजू बाड़ी एवं अन्य) में 28 नग मुनारे बनाए गए। लेकिन यहां तो विभाग ने कमाल ही कर दिया; पूरे का पूरा ₹1,68,000 का भुगतान ही अटका दिया गया है।

​इन दोनों रेंजों को मिलाकर गरीब मजदूरों का लगभग ₹8 लाख (कुल ₹7,99,000) वन विभाग की तिजोरी में ‘सुरक्षित’ रखा गया है।

कमीशन के बिना भुगतान ‘अवैध’ : मजदूरों ने शायद यह नादानी कर दी कि वे सिर्फ ईमानदारी से काम करना जानते हैं, विभागीय ‘प्रथा’ निभाना नहीं।

  • ​मजदूरों का साफ आरोप है कि उन्होंने बाज़ार से उधारी में सामग्री खरीदकर मुनारा निर्माण का काम पूरा किया, लेकिन अब भुगतान के नाम पर रेंजर साहब और बाबू उन्हें ‘आज-कल’ का खेल खिला रहे हैं।
  • ​शिकायत के अनुसार, अधिकारियों द्वारा खुलेआम कमीशन की मांग की जा रही है और बिना रिश्वत की भेंट चढ़ाए भुगतान की फाइलों को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

साहब की चौखट और न्यायालय की तैयारी : इस पूरी सरकारी ‘कृपा’ से प्रताड़ित होकर पीड़ित बजरंग कुमार और भरत राम ने अन्य मजदूरों के साथ मिलकर वनमंडलाधिकारी (DFO) महोदय के दरबार में अपनी लिखित शिकायत दर्ज करा दी है। आवेदन पर बाकायदा कार्यालय की सील लग चुकी है, यानी मामला उच्चाधिकारियों के संज्ञान में है।

अब कर्ज और उधारी के बोझ तले दबे मजदूर वन विभाग के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनके खून-पसीने की कमाई जल्द नहीं मिली, तो वे उग्र आंदोलन करेंगे। और अगर फिर भी ‘कमीशन-प्रेमी’ विभाग की नींद नहीं खुली, तो न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अलावा उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचेगा।

नोट : वहीं वन विभाग का पक्ष जानने ज़ब संवाददाता ने अधिकारीयों से फ़ोन पर संपर्क का प्रयास किया तो फ़ोन न उठाना भी गंभीर लगता है।

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