सूरजपुर आस्था के नाम पर ‘व्यवस्था’ या ‘कमाई का खेल’? कुदरगढ़ महोत्सव पर उठे गंभीर सवाल,,,
कुदरगढ़ महोत्सव में ‘आस्था’ के नाम पर खेल? बिना टेंडर काम बांटने के आरोप,,,
धार्मिक आयोजन या ‘कमाई का खेल’? कुदरगढ़ महोत्सव पर उठे गंभीर सवाल,,,
फोन कॉल से बंट रहे काम! कुदरगढ़ महोत्सव की तैयारियों पर विवाद,आस्था के मंच पर,,,
‘व्यवस्था’ पर सवाल—कुदरगढ़ महोत्सव घिरा आरोपों में जनता के बीच उठने लगे सवाल,,
क्या धार्मिक आयोजनों की पवित्रता को बनाए रखा जा रहा है?
क्या प्रशासन पारदर्शिता सुनिश्चित करने में विफल हो रहा है?
क्या जनहित की जगह निजी हित हावी हो रहे हैं?
शिव नाथ बघेल
दिनांक,20/03/2026,
लोकेशन, सूरजपुर छत्तीसगढ़,
सूरजपुर,20 मार्च 2026 ,, मां कुदरगढ़ देवी धाम,जो वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र रहा है,इस बार अपने वार्षिक महोत्सव को लेकर विवादों के घेरे में आ गया है, 23 से 25 मार्च तक आयोजित होने वाले तीन दिवसीय कुदरगढ़ महोत्सव 2026 की तैयारियों के बीच सामने आ रही व्यवस्थाओं ने प्रशासनिक पारदर्शिता, वित्तीय नियमों और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आस्था का आयोजन या सवालों का मंच?
हर वर्ष हजारों श्रद्धालु कुदरगढ़ धाम पहुंचकर मां बागेश्वरी के दर्शन करते हैं,यह महोत्सव न केवल धार्मिक महत्व रखता है,बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी जिले का एक बड़ा आयोजन माना जाता है, लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र श्रद्धा नहीं,बल्कि व्यवस्था और कार्य आवंटन की प्रक्रिया बन गई है, स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों ने इस आयोजन की निष्पक्षता पर संशय पैदा कर दिया है।

बिना टेंडर,बिना कोटेशन कैसे बंट रहे काम?
सूत्रों के अनुसार,महोत्सव से जुड़े कई कार्यों का आवंटन बिना टेंडर और बिना कोटेशन प्रक्रिया अपनाए ही किया जा रहा है,आरोप है कि कार्यों का बंटवारा तय नियमों के विपरीत हो रहा है,औपचारिक निविदा प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है,कुछ मामलों में सिर्फ फोन कॉल के आधार पर ही काम सौंपे जा रहे हैं,यदि ये आरोप सही हैं,तो यह सीधे तौर पर सरकारी वित्तीय नियमों का उल्लंघन माना जाएगा, आमतौर पर ऐसे आयोजनों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई जाती है,जिससे निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने का आरोप
स्थानीय चर्चाओं में यह बात भी सामने आ रही है कि कार्यों का आवंटन कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, यह आरोप केवल प्रक्रिया की अनदेखी तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भी संकेत देता है कि क्या पूरी व्यवस्था किसी विशेष समूह के हित में संचालित हो रही है? यदि ऐसा है,तो यह पूरे आयोजन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
आस्था बनाम ‘कमाई का खेल’
कुदरगढ़ महोत्सव को अब तक एक पवित्र धार्मिक आयोजन के रूप में देखा जाता रहा है,लेकिन वर्तमान हालात में यह सवाल उठना लाजिमी है क्या यह आयोजन अब कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बनता जा रहा है? क्या धार्मिक आयोजनों की आड़ में निजी लाभ की राजनीति हो रही है? इन सवालों ने आम जनता के बीच भी चर्चा को जन्म दे दिया है।
नियमों की अनदेखी या मिलीभगत?

यदि बिना टेंडर और कोटेशन के कार्य दिए जा रहे हैं, तो यह स्पष्ट रूप से वित्तीय नियमों का उल्लंघन है,ऐसे में दो संभावनाएं सामने आती हैं प्रशासनिक लापरवाही,संगठित मिलीभगत यह जांच का विषय है कि यह स्थिति केवल अनदेखी का परिणाम है या इसके पीछे कोई सुनियोजित व्यवस्था काम कर रही है।
आस्था की रक्षा या व्यवस्था की परीक्षा?
कुदरगढ़ महोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आस्था का प्रतीक है। ऐसे में यदि इस पर किसी भी प्रकार का संदेह उत्पन्न होता है,तो यह केवल प्रशासनिक नहीं,बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी गंभीर विषय बन जाता है,अब यह देखना होगा कि प्रशासन इन आरोपों को किस गंभीरता से लेता है और क्या पारदर्शिता के साथ इन सवालों का जवाब सामने आ पाता है या नहीं,क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ आयोजन का नहीं,बल्कि आस्था के सम्मान और जनता के विश्वास का है।
राजनीतिक दबाव की चर्चा ने बढ़ाई चिंता
मामले को और गंभीर बनाती है वह चर्चा,जिसमें कहा जा रहा है कि कुछ प्रभावशाली नेताओं का दबाव भी इस प्रक्रिया में सक्रिय है,सूत्रों के अनुसार अगर हमारे लोगों को काम नहीं मिला तो कार्यक्रम का बहिष्कार किया जाएगा,यदि इस तरह की चेतावनियां वास्तव में दी जा रही हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि यह दर्शाता है कि आस्था से जुड़े आयोजन को राजनीतिक प्रभाव और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाया जा रहा है।











